Friday, November 18, 2016

सेनारी: कल और आज

सेनारी नरसंघार में 35 लोगों की गला रेत कर निर्मम हत्या कर दी गयी थी. वैसे काटा तो 40 लोगों को था पर 5 की किस्मत अच्छी कह सकते हैं कि उस भयावह रात को याद करने के लिए कटे गले के साथ वो जिंदा बच गए हैं. इस मामले में पुलिस ने 45 लोगों को अभियुक्त बनाया था. 45 में से 23 को सबूत के अभाव में बरी कर दिया गया. तो फिर सवाल है कि 35 लोगों की हत्या क्या 20-22 लोगों ने मिलकर की थी. सभी शवों का पोस्टमार्टम गांव में ही 3 सरकारी डॉक्टरों ने किया था... पर उनकी गवाही नहीं हो सकीं...क्यों?

क्या ये राजनीतिक और प्रशासनिक विकलांग्ता नहीं थी?
ये सारे सवाल तर्कसंगत है या नहीं ये अदालत को निर्णय करना है.
18 मार्च 1999 के बाद सेनारी अब पहले जैसा नहीं रह गया. हर घर में एक, दो या चार सदस्य कम हैं. गांव में फिर कभी होली के रंग नहीं बिखरे...दिवाली की रौशनी नही हुई...त्योहारों ने जैसे मेरे ननिहाल से मुँह मोड़ लिया है. अब कभी गांव में मेले के मैदान नहीं सजते, मेले लगते हैं तो वो रौनक नहीं होती. दालानों पर दिनभर होने वाली ताश और शतरंज की बाजियों और गांव-जेवार और देश-दुनिया की खबरों के लिए होने वाली बैठकें ख़त्म हो गईं. बच्चों को घर से दूर हॉस्टल में डाल दिया गया. दूसरे जगह के लोग बड़ी उत्सुकता से उस काली रात का आँखों देखा हाल अब फिर से पूछने लगे हैं.  मेरे ननिहाल के लोग आंखों में आंसू लिए रुंधे गले से उस दर्दनाक घटना की आपबीती सुनाते हैं. इसी के साथ उनके जख्म भी कुरेद दिए जाते हैं. वो भयानक फिर से उनकी आंखों के आगे तैर जाता.

नरसंहार के बाद सरकार ने चंद रुपयों की पट्टी भी बंधी पर साथ कभी खड़े नहीं हुए. एक लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र पर ही सवाल खड़ा हो गया जब सरकार ने ये ऐलान किया कि - "हम सेनारी का दौरा नहीं करेंगे क्योंकि वहां के लोग हमें वोट नहीं देते.' वोटर तो पाकिस्तान में भी नहीं थे जनाब...फिर क्यों गए? साफ़ तौर पर शर्म से मुँह छुपाने के लिए मतदाताओं का पर्दा किया गया था.

सेनारी इन सबको पीछे छोड़ कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है. इस परिवर्तन की कोशिश में बहुत से नौजवानों ने अपने जीवन को एक दिशा देने की कोशिश की है. पर कुछ नौजवान ऐसे भी हैं जिन्होंने इस नरसंहार को आंखों के सामने होते हुए देखा था और इसलिए समानार्थक समाज से अलग विरोधी और उग्र रूप को आदर्श बना बैठे. मेरे सबसे बड़े मामा परीक्षित शर्मा बच्चों के पढ़ने और एक उज्जवल भविष्य बनाने पर जोर देते थे. उनकी वजह से नरसंहार के समय जहां किसी भी गांव में हर घर में आपको बंदूकों की खेप मिलती थी, हमारे गांव में एक हथियार नहीं मिला. क्योंकि हमारा गांव सिर्फ और सिर्फ पढ़ने और ईमानदारी की रोटी खाने पर भरोसा करता था. लेकिन अब उसी गांव के बच्चे जो हथियारों के बस नाम जानते थे अब हथियारों का ही खिलौना साथ रखते हैं. अब सेनारी एक गाँव भर नहीं है, एक विशेषण बन गया है. नरसंहार के बाद गांव के नौजवान सारे दलित गांव को "सेनारी"  बना देना चाहते थे.

इन सबके बीच कइयों ने इसको अपनी नियति मानकर अपने भाई-बाप के सपनों को साकार करने में जुट गए. पर हाँ दो विभाजित सोचों का असर तो मेरे सेनारी पर ही पड़ा है. कहते हैं समय के साथ घाव भर जाते हैं, पर निशान कहां मिटने वाले होते हैं. वो निशान जो नरसंहार में गला कटने के बाद बच गए 5 लोगों के शरीर पर दिखता है. वो निशान जो उस भयानक रात के गवाह बने हम जैसे बच्चों के जेहन पर पड़ा है. जो ठाकुरबाड़ी कभी लोगों से गुलजार हुआ करता था अब उजाड़ है. आज भी लोगों ने उसका बहिष्कार कर रखा है. क्योंकि उन्ही ठाकुर जी के दरवाजे पर पूरा गांव श्मशान में बदल गया और किसी ने साथ नहीं दिया. इसके ही दरवाजे पर लोगो ने अपनों को साथ छोड़ते देखा था.

आज सेनारी एक बिखरा हुआ मगर विकसित गांव बन चुका है. सड़के हैं पर चलने वाला कोई नहीं, पक्के मकान हैं पर घर छूट चूका है. सारे गांव के लोग शहरों की आबादी बन गए हैं.  गांव में 18-20 घंटे बिजली है, चकाचक, पर लोगों के दिलों के साथ घरों में भी अँधेरा ही पसरा रहता है. चूल्हे पर रोटियां तो आज भी पकती हैं पर वो प्यार, वो दुलार नहीं रहा जिसके लिए लोग सेनारी को जानते थे. कोई भी इस गांव से भूखा नहीं जाता था.

नरसंहार पर आया फैसला मेरे टूटे हुए, छूटे हुए, मिटे हुए ननिहाल को वापस नहीं ला सकता. मेरे नाति होने का दुलार वापस नहीं दिला सकता.

Wednesday, November 16, 2016

सेनारी नरसंहार

'सेनारी' मेरा ननिहाल हैं, और पूरा गांव मेरे लिए बस ननिहाल ही था | कोई एक घर नहीं, सारे घरों में सामान प्यार और दुलार मिलता है| मेरे तो वहां  हर घर में नाना, मामा थे| १७ साल पहले सब ने एक, दो या चार परिवार के सदस्य खोये थे पर मेरा तो ननिहाल ही खत्म हो गया था| मेरे हर घर में ना मामू थे, ना कोई नाना| बस चीखें थी| मैं छोटा था, इतनी समझ भी नहीँ आई कुछ,  बस मम्मी ने बताया की सब ख़त्म हो गया है| कोई नहीं बचा है|
मैंने पूछा कोई नहीं बचा है का क्या मतलब । मम्मी ने बोला-सब चले हाय हैं अब गांव में कोई नहीं है । मैं एक एक करके अपने मामुयो के नाम ले रहा था और मम्मी ना में सर हिलाये जा रही थी । वह बस एक ही चीज़ दोहराये जा रही थी-जल्दी जाना है सेनारी । गांव में कोई वाहन नहीं था । बाबा जल्दी से मम्मी को साथ लेकर चले गए और मैं अपने गांव रह गया । मेरे यहाँ लोगो की भीड़ लगी थी और मैं भौंचक्क सब को देख रहा था ।।।कई सवाल थे मेरे मन में । आज वृहस्पतिवार का दिन था । मम्मी को कहा पता था कि भगवान विष्णु की उपासना के बाद उसको ऐसी खबर रेडियो देगा । सेनारी के नागरिको से ज्यादा पढ़े लिखे लोग शायद ही किसी गाँव में हो । जज से लेकर डाक्टर तक सब थे वहां ,पर आज सब टूट चुके थे ।जिस गांव में लोग दलितों को अपने द्वार पर भोजन कराते थे उनके मन में आज दलितों के लिए रोष भर गया था ।बच्चो के मन में अपने भाई बाप के मौत का बदला लेने का जुनून सवार था ।
एक खुशहाल गांव नाजुक अंधेर भविष्य के ओर देख रहा था । बची खुची कसर स्थनीय पुलिस प्रशाशन ने पूरी कर दी थी । महिलायों के करुण विलाप को दवाने के लिए लाठीचार्ज किया गया ।जब इस दर्दनाक दुःख की घडी में रक्षक ही भक्षक बन जाये तो क्या मनोस्थिति रही होगी उस गाँव की जरा सोचिए ।
क्या  वो पुलिसकर्मी नर्संहरकर्ता से कम दोषी थे ?
आज सेनारी नरसंहार को १७ साल बीत चुके हैं| जीवन पटरी पर भी लौट चुकी है पर अपनों के खोने का गम सहसा एक पल में उभर आया है|
आज एक फैसला आया है| सेनारी नरसंहार के आरोपियों को फाँसी और उम्रकैद की सजा मिली है| ये फैसला जान गवाने वाले  परिवारों के जख्मों पर कितना मलहम लगाएगा ये तोह नहीं पता पर उनकी उस दर्दनाक घटना की यादाश्त को जरूर जीवित कर देगा ।बहुत सी माँ, पत्नियां शायद ज़िंदा भी नहीं हैं इस फैसले को सम्मान करने के लिए|
खैर,...१० लोगों को फाँसी हुई- ३४ मारे गए थे| 3 को उम्रकैद मिला है और सेनारी में ३० से ज्यादा परिवारों को  उम्र भर की संवेदनहीन-उद्देश्यहीन जीवन मिला था| कितना न्यायसांगत है ये प्रश्न उठाना हम नहीं जानते पर ये जरूर पढ़ा है की 'justice delayed is justice denied ' अभी इस फैसले पर और बहस और ऊपरी अदालत में आवेदन की संभावना बचती है, पर मुझे आगे भी न्याय की अपेक्षा हैं|
देर आये दुरुस्त आये| शायद अपनों को खोने का दर्द अब समझ आए|  सजा तोह हथियारो को हुई है, हथियार चलाने वाले अब भी सरकार पर काबिज़ हैं|