सेनारी नरसंघार में 35 लोगों की गला रेत कर निर्मम हत्या कर दी गयी थी. वैसे काटा तो 40 लोगों को था पर 5 की किस्मत अच्छी कह सकते हैं कि उस भयावह रात को याद करने के लिए कटे गले के साथ वो जिंदा बच गए हैं. इस मामले में पुलिस ने 45 लोगों को अभियुक्त बनाया था. 45 में से 23 को सबूत के अभाव में बरी कर दिया गया. तो फिर सवाल है कि 35 लोगों की हत्या क्या 20-22 लोगों ने मिलकर की थी. सभी शवों का पोस्टमार्टम गांव में ही 3 सरकारी डॉक्टरों ने किया था... पर उनकी गवाही नहीं हो सकीं...क्यों?
क्या ये राजनीतिक और प्रशासनिक विकलांग्ता नहीं थी?
ये सारे सवाल तर्कसंगत है या नहीं ये अदालत को निर्णय करना है.
18 मार्च 1999 के बाद सेनारी अब पहले जैसा नहीं रह गया. हर घर में एक, दो या चार सदस्य कम हैं. गांव में फिर कभी होली के रंग नहीं बिखरे...दिवाली की रौशनी नही हुई...त्योहारों ने जैसे मेरे ननिहाल से मुँह मोड़ लिया है. अब कभी गांव में मेले के मैदान नहीं सजते, मेले लगते हैं तो वो रौनक नहीं होती. दालानों पर दिनभर होने वाली ताश और शतरंज की बाजियों और गांव-जेवार और देश-दुनिया की खबरों के लिए होने वाली बैठकें ख़त्म हो गईं. बच्चों को घर से दूर हॉस्टल में डाल दिया गया. दूसरे जगह के लोग बड़ी उत्सुकता से उस काली रात का आँखों देखा हाल अब फिर से पूछने लगे हैं. मेरे ननिहाल के लोग आंखों में आंसू लिए रुंधे गले से उस दर्दनाक घटना की आपबीती सुनाते हैं. इसी के साथ उनके जख्म भी कुरेद दिए जाते हैं. वो भयानक फिर से उनकी आंखों के आगे तैर जाता.
नरसंहार के बाद सरकार ने चंद रुपयों की पट्टी भी बंधी पर साथ कभी खड़े नहीं हुए. एक लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र पर ही सवाल खड़ा हो गया जब सरकार ने ये ऐलान किया कि - "हम सेनारी का दौरा नहीं करेंगे क्योंकि वहां के लोग हमें वोट नहीं देते.' वोटर तो पाकिस्तान में भी नहीं थे जनाब...फिर क्यों गए? साफ़ तौर पर शर्म से मुँह छुपाने के लिए मतदाताओं का पर्दा किया गया था.
सेनारी इन सबको पीछे छोड़ कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है. इस परिवर्तन की कोशिश में बहुत से नौजवानों ने अपने जीवन को एक दिशा देने की कोशिश की है. पर कुछ नौजवान ऐसे भी हैं जिन्होंने इस नरसंहार को आंखों के सामने होते हुए देखा था और इसलिए समानार्थक समाज से अलग विरोधी और उग्र रूप को आदर्श बना बैठे. मेरे सबसे बड़े मामा परीक्षित शर्मा बच्चों के पढ़ने और एक उज्जवल भविष्य बनाने पर जोर देते थे. उनकी वजह से नरसंहार के समय जहां किसी भी गांव में हर घर में आपको बंदूकों की खेप मिलती थी, हमारे गांव में एक हथियार नहीं मिला. क्योंकि हमारा गांव सिर्फ और सिर्फ पढ़ने और ईमानदारी की रोटी खाने पर भरोसा करता था. लेकिन अब उसी गांव के बच्चे जो हथियारों के बस नाम जानते थे अब हथियारों का ही खिलौना साथ रखते हैं. अब सेनारी एक गाँव भर नहीं है, एक विशेषण बन गया है. नरसंहार के बाद गांव के नौजवान सारे दलित गांव को "सेनारी" बना देना चाहते थे.
इन सबके बीच कइयों ने इसको अपनी नियति मानकर अपने भाई-बाप के सपनों को साकार करने में जुट गए. पर हाँ दो विभाजित सोचों का असर तो मेरे सेनारी पर ही पड़ा है. कहते हैं समय के साथ घाव भर जाते हैं, पर निशान कहां मिटने वाले होते हैं. वो निशान जो नरसंहार में गला कटने के बाद बच गए 5 लोगों के शरीर पर दिखता है. वो निशान जो उस भयानक रात के गवाह बने हम जैसे बच्चों के जेहन पर पड़ा है. जो ठाकुरबाड़ी कभी लोगों से गुलजार हुआ करता था अब उजाड़ है. आज भी लोगों ने उसका बहिष्कार कर रखा है. क्योंकि उन्ही ठाकुर जी के दरवाजे पर पूरा गांव श्मशान में बदल गया और किसी ने साथ नहीं दिया. इसके ही दरवाजे पर लोगो ने अपनों को साथ छोड़ते देखा था.
आज सेनारी एक बिखरा हुआ मगर विकसित गांव बन चुका है. सड़के हैं पर चलने वाला कोई नहीं, पक्के मकान हैं पर घर छूट चूका है. सारे गांव के लोग शहरों की आबादी बन गए हैं. गांव में 18-20 घंटे बिजली है, चकाचक, पर लोगों के दिलों के साथ घरों में भी अँधेरा ही पसरा रहता है. चूल्हे पर रोटियां तो आज भी पकती हैं पर वो प्यार, वो दुलार नहीं रहा जिसके लिए लोग सेनारी को जानते थे. कोई भी इस गांव से भूखा नहीं जाता था.
नरसंहार पर आया फैसला मेरे टूटे हुए, छूटे हुए, मिटे हुए ननिहाल को वापस नहीं ला सकता. मेरे नाति होने का दुलार वापस नहीं दिला सकता.
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