Monday, May 8, 2017

केजरीवाल की राह ।

आम आदमी पार्टी का नाम लेते ही दिमाग में अरविन्द केजरीवाल साहब आ जाते हैं। वो india against corruption के एक साफ़ सुथरे कार्यकर्ता थे। पर राह बदली और आ गए राजनीति में। आजादी के बाद हुए कुछ बड़े आंदोलनों में से एक था अन्ना आंदोलन और केजरी बाबू इसी की उपज थे। ऊपर से अन्ना हजारे के चेले, लोगो ने हाथों हाथ लिया. लोगों ने ये सोचा की नई टिकिया है सारे दाग साफ़ कर देगी। मैंने भी अपना पहला वोट इनको ही दिया। पार्टी को पारदर्शी बनाए रखने की बात हुई और कई नामचीन, दिग्गज पार्टी से जुड़ गए। इन दिग्गजो में मशहूर अभिनेत्री मल्लिका साराभाई, लाल बहादुर शास्त्री के पोते आदर्श शास्त्री जो apple में नौकरी छोड़ कर आये थे, समाजसेवी मेधा पाटकर , वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष, कैप्टेन जी. आर. गोपीनाथ, मीरा सान्याल जैसे अनेक नाम शामिल हैं. इन सभी ने पार्टी में विश्वास जताया था और इसके कार्यकर्ता बन गए थे। पार्टी तैयार हो गयी. 2012 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हो गए और इनकी सरकार भी बनी जो 49 दिन चली या फिर कहें की चलाई गई। अभी क्रांन्तिकारी आंदोलन से आये थे सो 49 दिन भी राजनीति के दांव पेंच झेल नहीं सके। भरपूर राजनीति सीखकर फिर से मैदान में आये और 70 में से 67 सीटों पर जबर्दस्त जीत हासिल कर सरकार बना लिए। अब एक्शन लेने की बारी थी और एक्शन लेने शुरू भी हो गए. बस शीला दीक्षित की कोई फाइल नहीं खुली जो वादों में प्रमुख था। सरकार के एक्शन जनता को साफ़ नहीं दिखाई पड़ रहे थे। पर अस्पतालों में, स्कूलों में कुछ काम हुआ था । पर कई ऐसी चीजें थीं जो जनता को साफ दिखाई दे रही थी, केजरीवाल साहब के रोज रोज के नखरे और लफड़ों में पड़ना। पहले अरुण जेटली ने 10 करोड़ के मानहानि का केस ठोक दिया, फिर सास बहू जैसे नजीब जंग से तना-तानी। और तो और अब केजरीवाल-मोदी दोष मंत्र भी कंठस्त कर चुके थे। इन सबके बीच पार्टी से कुलबुलाहट शुरू हुई. कोई ऐसे ही एप्पल और इनफ़ोसिस थोड़े न छोड़ कर आता है। सबको खुश रखने की कोशिश की गयी पर शाजिया इल्मी जैसे नेताओं ने अपने पैंतरे बदल लिए। एक झटका पहले बहिन किरण बेदी दे ही चुकी थी। मंत्रियो पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे और निशाना केजरीवाल को बनाया जाने लगा। कभी पार्टी के नेता जनरैल सिंह ने किसी इंजीनियर को पीट दिया, तो कभी किसी नेता की राशन कार्ड बनवाने के नाम पर बनाई गई ब्लू रौशनी वाली फिल्म ही बाहर आ गयी। कानून मंत्री की फर्जी डिग्री सामने आ गयी तो अलका लांबा और कई नेताओं पर परिवार को फायदा पहुचाने का मामला सामने आया। पर इन सबके बीच कभी केजरीवाल पर सीधा कोई आरोप नहीं लगा। लेकिन काजल की कोठरी में रहने वाला आखिर कितने दिन बेदाग़ रहता! और दोस्ती टूटते ही दोस्त ने पोल खोल दी. अब तक सब ठीक था पर कपिल मिश्रा जी, जो कानून मंत्री के साथ साथ जल विभाग के भी मुखिया थे, उन्होंने कह दिया की 400 करोड़ में से 2 करोड़ अपने केजरी भाई ने भी दबाए थे। अब वो बोलते क्यों नहीं, पद के साथ पदवी जो छीन गयी थी। वैसे भी कपिल मिश्रा जी की माँ बीजेपी की कार्यकर्ता हैं... बागी तो होना ही था क्योंकि पढ़े लिखे भी थे, तो इन्होंने कहीं पढ़ा था- never love your employer.. बस ये बात अपने केजरीवाल साहब नहीं समझ पाए थे, आम आदमी थे न... आगे तो हमें भी इंतज़ार है कि केजरीवाल साहब कैसे पाक साफ बने रहते हैं। मुश्किल समय है, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे दोस्तों ने तो साथ छोड़ ही दिया था. अब कुमार विश्वास के भी बोल अविश्वसनीय लग रहे हैं। मैंने भी किनारा कर लिया है क्योंकि जो वादा फ्री इन्टरनेट का केजरीवाल साहब ने किया था वो मुकेश अंबानी पूरा कर चुके हैं और बाकि वादों पर भी काम होता दिख नहीं रहा है। वैसे मैंने थोड़ा गुस्सा नगर निगम चुनावों में भी दिखा दिया है और अगर नहीं संभले और सीख नहीं ली तो जीवन भर "दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री" की सुविधाएं लेते रहेंगे. वैसे भी वेतन तो 4 गुना कर ही लिया है। बस केजरीवाल जी से मेरा इतना ही अनुरोध है कि india against corruption के कार्यकर्ता जैसा बर्ताव करें क्योंकि अब मैं आपसे खुद को जोड़ नहीं पा रहा हूँ। कुछ तो वजह होगी आपकी इन परेशानियों की, छूटते यारो की, फिसलते दिल्ली की, मुकरते वादों की। अपनी प्राथमिकता को बदलिए। खुद को बदल कर हमारे बीच आईए... वही प्यार मिलेगा ।

Sunday, December 18, 2016

नोटबंदी : इस कोठी का धान उस कोठी

इस बार की सर्दी में गर्मी कुछ ज्यादा ही है ।मुझसे तो स्वेटर पहनकर बिलकुल लाइन में लगा नहीं जाता..एक दो घंटे तो संभाल भी लूँ पर 4-5 घंटे में पसीने छूट जाते हैं । कोई बात नहीं देश से कालाधन मिट रहा है... शायद !
लाइन में लगे लगे अब तो जान पहचान भी हो गयी है...मूंगफली की पार्टी भी चलती है पर इन  बीच पैसे देकर खड़े किये गए लोग नजर नहीं आते जिसके बारे में कल एक महाशय टीवी पर बोल रहे थे ।
मोदी साहब ने मुझे में दो अच्छे बदलाव ला दिए हैं जो मम्मी नही ला पायी थी । पहली सुबह जल्दी उठने की और दूसरी रोज पेपर पढ़ने की । सुबह उठ जाता हूँ क्योंकि लाइन में 8 बजे तक 75वा नंबर तक मिल जाता है और पेपर इसलिए पढता हूँ क्योंकि रोज मोदी जी अपनी टीम के साथ नए रूल बना देते हैं...उत्सुकता खत्म नहीं होने देते, रोज पढता हूँ की आज नोट कितने मिलेंगे, अब कहाँ चलेंगे, कहाँ नहीं चलेंगे ,और नया क्या होगा ।
ये नोटो का खेल बड़ा पुराना है । कभी वापस आते हैं कभी बंद होते हैं ।
1946 के पहले 1000 के नोट चलते थे,फिर 1946 में बंद हो गये । फिर 1954 में  1000, 5000, 10000 के नोट आ गये और 1978 सब बंद हो गए । फिर 1987 में 500 आया और 2000 में 1000 । फिर 2016 में दोनों ने अपनी रंगत बदलकर मुश्किल में डाल दिया । तो जब भी सरकारों को बोरिंग सा फील होता वो देहाती कहावत "इस कोठी का धान उस कोठी" को सार्थक करने में जुट जाते हैं ।
किसी ने कहा है कि अपने लोगो को भी नहीं पता था , किसी ने कहा है कि अपने लोगो ने सब ठिकानें लगा दिये..जमीनें खरीद ली..किसी ने कहा अम्बानी को सब पता था क्योंकि उर्जित पटेल पहले अम्बानी के सलाहकार थे । अब इन सब को कौन शोध कर के प्रमाणित करें ,मुझे तो टमाटर 15 रूपये किलो मिलने शुरू हो गये हैं । सब बोल रहे थे की डिजिटल हो जाओ...खर्च करो नहीं तो आर्थिक मंदी आ जायेगी ,तो भाई खर्च करे तो क्या करें..
पैसा तो हो ।
कहाँ कहाँ डिजिटल हो जाये ..समझ नहीं आ रहा है । गोलगप्पे पर हो जाये या मूंगफली पर ...या फिर दहेज़ भी डिजिटल ही कर ही दे दें क्या पर वो तो मान ही नहीं रहे हैं , उनको तो नगद चाहिए ।
दूर खड़े होकर रास्ता मत बताईये...फिक्र है तो एक काम कीजिये..कल हमको सोने दीजिये और लाइन में लग जाईये मेरे बदले ।

Friday, December 9, 2016

रौनकदार चुनावी मौसम

चुनावी मौसम ने आहें भरना सुरु कर दिया है । कुछ राज्यो में चुनाव होने हैं...धूल उड़नी है..हेलीकॉप्टर आने हैं...धर्मों को जानना है..दंगो का हिसाब होना है..रंगों को पहचानना है ...आंकड़ो का खेल होगा..एम्बुलेंस में पिंक मनी मिलेगी..गंगा नहाया जायेगा..गंगा साफ़ होगा...रोना धोना होगा..राम मंदिर शायद बन जायेगा...बांग्लादेशी बाहर होंगे...हीरो-हेरोइएनी भी आएगी...दारु - मिजाज की तो पूछो ही मत ।
कुछ खरच - बरच भी बटेंगे..और हाँ हमको तो बस इंतज़ार है फिर से इस बार की रिपोर्ट कार्ड की..अरे वही रिपोर्ट कार्ड जो एक पार्टी दूसरे को देती है कि कितना खाये और कितना पचाये..ठीक उसी तरह जैसे मास्टर जी हमारी मम्मी से कहते थे..कि 'बहिन आपने "नारपिचास" पैदा किया है,आपका ये "शहजादा" कुछ ना कर पायेगा..एक दम पप्पू है पप्पू । अभी तो एकदम थोक भाव से शिलान्यास और उद्धघाटन होंगे...श्रेय लेने की मारामारी अलग से..। इसबार नेता जी की एक रैली हमरो गांव में हो जाये बस..चकाचक रोड बन जायेगा 10 दिन में..कम से कम 2 महीना गांव के बच्चा सब साइकिल तो चला लेगा..फिर तो बरसात में खेती हो ही जायेगा उस पर ।
रामविस्वास लोहार कह रहा था कि उसके पास नेता सब के अभी से आर्डर आने सुरु हो गए हैं..जीभ के धार तेज़ करने के लिए...। हमनें तो यहाँ तक सुना है की ये नेता दोनों तरफ की धार तेज़ कराये रखते हैं..पता ना कब कहाँ का दाना पानी बंद हो जाये और कहाँ पालथी मारना पड़े ।

त्रिलोकी दादा का बेटा अमेरिका से आया है,बता रहा था कि वहाँ भी अभी -अभी चुनाव ख़त्म हुआ है और हिलेरी बहिन हार गयीं । उसने बताया कि ट्रम्प चाचा जीते हैं..बहुत अमीर हैं..बहुत बड़ा घर है..व्यापर है..सोने का संडास है । ये सुन कर हमको यक़ीन हो गया कि भारत -अमेरिका भाई है..सहोदर ,तभी तो एकदम एक जैसा लोग चुनता है। हमने भी पूछ लिया की तब, तुम बतायो वहाँ का चुनावी गालियां ...दो-चार तो सीखा ही होगा ?
उसने बोला की अमेरिका में चुनाव में गाली नहीं देते हैं बल्कि तथ्यों पर बोलते हैं ..?
बगल में बैठी तुलसी चाची बोली -का...? कौनो नेता गाली नहीं देत है?
हमने भी पूछ लिया मतलब  वहाँ कोई मौत का सौदागर...खुनी पंजा..असली बाप का..मुह  पर थूकना ..ज़हर की खेती..ये सब नहीं कहते एक दूसरे को ?
उसने कहा कि नहीं..वो लोग आगे क्या काम करेंगे इसकी पूरी प्लानिंग और आमने सामने बैठकर बात करते हैं..।विलायती बाबू बोले  :- तो क्या यहाँ ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं .? अब हम उनको कैसे बताये की हमारे यहाँ के चुनावी जुमलो के आगे तो सलीम - जावेद भी पानी भरते हैं।
हमने मन ही मन कहा धत तेरी की..ये कैसा चुनाव ,एतना शांति से..बिना मज़ा के..बिना गली गलौज के....भारत में संभव है क्या ??
भारत में संभव है क्या की सभी घोषणाए  बिना चुनावी रंगत योढे  हो? झूठे वादे ना हो ?
सोच ही रहा था कि एक टेम्पो गाना बजाते आगे बढ़ा...गाना पार्टी विशेष की वंदना थी । रघुपति दादा बोल पड़े-अच्छा गाना है हो..इस बार इसी को वोट दिया जाये ।
विलायती बाबू आश्चर्य से इनकी तरफ देखकर पूछे तो क्या आपलोग गाना पर वोट देते हैं ...??
मैं बोल पड़ा-कुछो पर दे क्या फर्क पड़ता है वैसे इसबार उसको देंगे जो बिजली देगा .।
इसबार दुगनी आश्चर्य से पूछा क्या गांव में बिजली नहीं है ?..पोल तो खड़ा है..तार भी है ...बाहर बोर्ड भी लगा है कि इस गाँव का विधुतीकरण कर दिया गया है और उस पर तो पांच साल पहले की तारीख भी है....! सब ने इसबार एक स्वर में कहा- welcome to "Bharat". और तभी एक टेम्पो एक व्यक्ति विशेष की मधुर स्तुति करते हुए गुजर गया ।

Tuesday, December 6, 2016

Unboxing the memories

We all had boxes of different sizes but all full of same amount of love,affection,Wafers and secrets..some had dirty secrets too...those were not only iron casted containers but our feelings boxed with so many stickers on the panel....sometimes a joy... Sometimes a threat..curiosity for others... Treasures for ourselves... Duty of teachers to check...duty of ours to hide things..
Sundays..for rearrangements..really???
Only for a few who enjoys it..
Today we don't have them..even we don't need them actually...but when we try to remember all those roll number marked boxes.. We miss them..we miss the life we lived..we enjoyed..we miss the dabba full of acchar and nimki we have kept in them...I Pratik Sawarnaya miss them..
Do you??

अम्मा..जिसको कोई समझ ना सका ।

अम्मा को खोने का दुःख है । व्यक्तिगत रूप से ना उनके जीवन को ज्यादा पढ़ा है न समझा है...राजनीतिज्ञ थीं..लोगो से उनका अविभाजित लगाव था । मैं उनके करीबी लोगों में से नहीं हूँ पर समर्थको के आंसू झूठे नहीं लग रहे हैं और इसी आधार पर लिख रहा हूँ ।
मेरी व्यक्तिगत रूचि तब जागी थी अम्मा को जानने में जब 1997 में विजिलेंस ने उनके यहाँ से 10500 साड़िया और 750 जोड़ी जुते बरामद किये थे । बड़ा आश्चर्य हुआ था..तब जाकर पता चला की ये राजनीतिज्ञ एक विख्यात अभिनेत्री और नर्तकी थी। बाद में इनके राजनीतिक सफर को भी पढ़ा  पर वो कभी नहीं मिला जो मैं जानना चाहता था।

1982-84 से सक्रिय रहकर 1991 में मुख्यमंत्री बन जाना अपने आप में रोचक था...सफर की दास्ताँ भी सफल लोगो से मेल खाती थी..मसलन इन्होंने भी विरोध झेले..परेशानियां उठाई...साड़ी फाड़ दी गयी..पीटा गया..घसीटा गया...वो रो रही थी...उन्ही के पार्टी के विधायक सब देख रहे थे...वो भी विधान सभा में..और भी बहुत कुछ हुआ शुरुआती राजनितिक जीवन में...फिर अम्मा ने सर उठाया और बाकियों को नतमस्तक कराया...और भी बहुत सारी घटनाएँ और कहानियां पढ़ा और जाना जो जयललिता को अम्मा बनाती थीं ।

मैं "जयललिता" के जीवन को जानने का उत्सुक था...पर पता चला की उनकी शख्शियत ऐसी थी की उनके अपने मंत्री तक उनसे बात करने में डरते थे..फिर किसकी मजाल थी जो अम्मा की जीवनी बताये..हाँ अम्मा ने खुद कई बार कहा कि उनका जीवन एक खुली किताब है । पर मैं समझता हूँ की उस खुली किताब में ऐसी भाषा लिखी होगी जिसको आज तक सिर्फ पनीरसेल्वम और शशिकला ने ही समझा । सोनिया गांधी संग चाय और वाजपेयी सरकार को समर्थन ...ऐसे व्यक्तित्व को समझना कहा आसान था ? वह हर चीज में  अव्वल थीं..10वीं में टॉपर..अभिनेत्री बनकर नाम और इनाम सब कमाये....राजनीति का रुख किया तो लोगों की अम्मा बन बैठी..अपने अंतिम सफर में भी राष्ट्रीय सम्मान के साथ विदा लिया ।

विरोधियो को नजरअंदाज कर के सहेली के बेटे की शाही शादी करवाना सब की वश की बात कहा थीं। चेन्नई जब बाढ़ से डूब रहा था और 2 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने थे...विरोधियो ने अपनी जीत पक्का समझ लिया था..उस वक़्त भी अम्मा ने उन्हें अपनी और उनकी औकात बता दिया और फिर सत्ता पर काबिज हुईं । 1991 से 2016 तक 25 सालों में 6 बार प्रदेश की मुख्यमंत्री ..यही अम्मा की पहचान थी ।

तामिलनाडु में BPL परिवारों को 20 किलो अनाज..14 रूपये किलो नमक, 5 रूपये में खाना,10 रूपये में पानी, मोबाइल, अम्मा सिनेमा घर, बेबी किट और न जाने क्या क्या...ये सब अम्मा ही कर सकती थीं ।
।।।।।।।........आपको सलाम........।।।।।।

Friday, November 18, 2016

सेनारी: कल और आज

सेनारी नरसंघार में 35 लोगों की गला रेत कर निर्मम हत्या कर दी गयी थी. वैसे काटा तो 40 लोगों को था पर 5 की किस्मत अच्छी कह सकते हैं कि उस भयावह रात को याद करने के लिए कटे गले के साथ वो जिंदा बच गए हैं. इस मामले में पुलिस ने 45 लोगों को अभियुक्त बनाया था. 45 में से 23 को सबूत के अभाव में बरी कर दिया गया. तो फिर सवाल है कि 35 लोगों की हत्या क्या 20-22 लोगों ने मिलकर की थी. सभी शवों का पोस्टमार्टम गांव में ही 3 सरकारी डॉक्टरों ने किया था... पर उनकी गवाही नहीं हो सकीं...क्यों?

क्या ये राजनीतिक और प्रशासनिक विकलांग्ता नहीं थी?
ये सारे सवाल तर्कसंगत है या नहीं ये अदालत को निर्णय करना है.
18 मार्च 1999 के बाद सेनारी अब पहले जैसा नहीं रह गया. हर घर में एक, दो या चार सदस्य कम हैं. गांव में फिर कभी होली के रंग नहीं बिखरे...दिवाली की रौशनी नही हुई...त्योहारों ने जैसे मेरे ननिहाल से मुँह मोड़ लिया है. अब कभी गांव में मेले के मैदान नहीं सजते, मेले लगते हैं तो वो रौनक नहीं होती. दालानों पर दिनभर होने वाली ताश और शतरंज की बाजियों और गांव-जेवार और देश-दुनिया की खबरों के लिए होने वाली बैठकें ख़त्म हो गईं. बच्चों को घर से दूर हॉस्टल में डाल दिया गया. दूसरे जगह के लोग बड़ी उत्सुकता से उस काली रात का आँखों देखा हाल अब फिर से पूछने लगे हैं.  मेरे ननिहाल के लोग आंखों में आंसू लिए रुंधे गले से उस दर्दनाक घटना की आपबीती सुनाते हैं. इसी के साथ उनके जख्म भी कुरेद दिए जाते हैं. वो भयानक फिर से उनकी आंखों के आगे तैर जाता.

नरसंहार के बाद सरकार ने चंद रुपयों की पट्टी भी बंधी पर साथ कभी खड़े नहीं हुए. एक लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र पर ही सवाल खड़ा हो गया जब सरकार ने ये ऐलान किया कि - "हम सेनारी का दौरा नहीं करेंगे क्योंकि वहां के लोग हमें वोट नहीं देते.' वोटर तो पाकिस्तान में भी नहीं थे जनाब...फिर क्यों गए? साफ़ तौर पर शर्म से मुँह छुपाने के लिए मतदाताओं का पर्दा किया गया था.

सेनारी इन सबको पीछे छोड़ कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है. इस परिवर्तन की कोशिश में बहुत से नौजवानों ने अपने जीवन को एक दिशा देने की कोशिश की है. पर कुछ नौजवान ऐसे भी हैं जिन्होंने इस नरसंहार को आंखों के सामने होते हुए देखा था और इसलिए समानार्थक समाज से अलग विरोधी और उग्र रूप को आदर्श बना बैठे. मेरे सबसे बड़े मामा परीक्षित शर्मा बच्चों के पढ़ने और एक उज्जवल भविष्य बनाने पर जोर देते थे. उनकी वजह से नरसंहार के समय जहां किसी भी गांव में हर घर में आपको बंदूकों की खेप मिलती थी, हमारे गांव में एक हथियार नहीं मिला. क्योंकि हमारा गांव सिर्फ और सिर्फ पढ़ने और ईमानदारी की रोटी खाने पर भरोसा करता था. लेकिन अब उसी गांव के बच्चे जो हथियारों के बस नाम जानते थे अब हथियारों का ही खिलौना साथ रखते हैं. अब सेनारी एक गाँव भर नहीं है, एक विशेषण बन गया है. नरसंहार के बाद गांव के नौजवान सारे दलित गांव को "सेनारी"  बना देना चाहते थे.

इन सबके बीच कइयों ने इसको अपनी नियति मानकर अपने भाई-बाप के सपनों को साकार करने में जुट गए. पर हाँ दो विभाजित सोचों का असर तो मेरे सेनारी पर ही पड़ा है. कहते हैं समय के साथ घाव भर जाते हैं, पर निशान कहां मिटने वाले होते हैं. वो निशान जो नरसंहार में गला कटने के बाद बच गए 5 लोगों के शरीर पर दिखता है. वो निशान जो उस भयानक रात के गवाह बने हम जैसे बच्चों के जेहन पर पड़ा है. जो ठाकुरबाड़ी कभी लोगों से गुलजार हुआ करता था अब उजाड़ है. आज भी लोगों ने उसका बहिष्कार कर रखा है. क्योंकि उन्ही ठाकुर जी के दरवाजे पर पूरा गांव श्मशान में बदल गया और किसी ने साथ नहीं दिया. इसके ही दरवाजे पर लोगो ने अपनों को साथ छोड़ते देखा था.

आज सेनारी एक बिखरा हुआ मगर विकसित गांव बन चुका है. सड़के हैं पर चलने वाला कोई नहीं, पक्के मकान हैं पर घर छूट चूका है. सारे गांव के लोग शहरों की आबादी बन गए हैं.  गांव में 18-20 घंटे बिजली है, चकाचक, पर लोगों के दिलों के साथ घरों में भी अँधेरा ही पसरा रहता है. चूल्हे पर रोटियां तो आज भी पकती हैं पर वो प्यार, वो दुलार नहीं रहा जिसके लिए लोग सेनारी को जानते थे. कोई भी इस गांव से भूखा नहीं जाता था.

नरसंहार पर आया फैसला मेरे टूटे हुए, छूटे हुए, मिटे हुए ननिहाल को वापस नहीं ला सकता. मेरे नाति होने का दुलार वापस नहीं दिला सकता.

Wednesday, November 16, 2016

सेनारी नरसंहार

'सेनारी' मेरा ननिहाल हैं, और पूरा गांव मेरे लिए बस ननिहाल ही था | कोई एक घर नहीं, सारे घरों में सामान प्यार और दुलार मिलता है| मेरे तो वहां  हर घर में नाना, मामा थे| १७ साल पहले सब ने एक, दो या चार परिवार के सदस्य खोये थे पर मेरा तो ननिहाल ही खत्म हो गया था| मेरे हर घर में ना मामू थे, ना कोई नाना| बस चीखें थी| मैं छोटा था, इतनी समझ भी नहीँ आई कुछ,  बस मम्मी ने बताया की सब ख़त्म हो गया है| कोई नहीं बचा है|
मैंने पूछा कोई नहीं बचा है का क्या मतलब । मम्मी ने बोला-सब चले हाय हैं अब गांव में कोई नहीं है । मैं एक एक करके अपने मामुयो के नाम ले रहा था और मम्मी ना में सर हिलाये जा रही थी । वह बस एक ही चीज़ दोहराये जा रही थी-जल्दी जाना है सेनारी । गांव में कोई वाहन नहीं था । बाबा जल्दी से मम्मी को साथ लेकर चले गए और मैं अपने गांव रह गया । मेरे यहाँ लोगो की भीड़ लगी थी और मैं भौंचक्क सब को देख रहा था ।।।कई सवाल थे मेरे मन में । आज वृहस्पतिवार का दिन था । मम्मी को कहा पता था कि भगवान विष्णु की उपासना के बाद उसको ऐसी खबर रेडियो देगा । सेनारी के नागरिको से ज्यादा पढ़े लिखे लोग शायद ही किसी गाँव में हो । जज से लेकर डाक्टर तक सब थे वहां ,पर आज सब टूट चुके थे ।जिस गांव में लोग दलितों को अपने द्वार पर भोजन कराते थे उनके मन में आज दलितों के लिए रोष भर गया था ।बच्चो के मन में अपने भाई बाप के मौत का बदला लेने का जुनून सवार था ।
एक खुशहाल गांव नाजुक अंधेर भविष्य के ओर देख रहा था । बची खुची कसर स्थनीय पुलिस प्रशाशन ने पूरी कर दी थी । महिलायों के करुण विलाप को दवाने के लिए लाठीचार्ज किया गया ।जब इस दर्दनाक दुःख की घडी में रक्षक ही भक्षक बन जाये तो क्या मनोस्थिति रही होगी उस गाँव की जरा सोचिए ।
क्या  वो पुलिसकर्मी नर्संहरकर्ता से कम दोषी थे ?
आज सेनारी नरसंहार को १७ साल बीत चुके हैं| जीवन पटरी पर भी लौट चुकी है पर अपनों के खोने का गम सहसा एक पल में उभर आया है|
आज एक फैसला आया है| सेनारी नरसंहार के आरोपियों को फाँसी और उम्रकैद की सजा मिली है| ये फैसला जान गवाने वाले  परिवारों के जख्मों पर कितना मलहम लगाएगा ये तोह नहीं पता पर उनकी उस दर्दनाक घटना की यादाश्त को जरूर जीवित कर देगा ।बहुत सी माँ, पत्नियां शायद ज़िंदा भी नहीं हैं इस फैसले को सम्मान करने के लिए|
खैर,...१० लोगों को फाँसी हुई- ३४ मारे गए थे| 3 को उम्रकैद मिला है और सेनारी में ३० से ज्यादा परिवारों को  उम्र भर की संवेदनहीन-उद्देश्यहीन जीवन मिला था| कितना न्यायसांगत है ये प्रश्न उठाना हम नहीं जानते पर ये जरूर पढ़ा है की 'justice delayed is justice denied ' अभी इस फैसले पर और बहस और ऊपरी अदालत में आवेदन की संभावना बचती है, पर मुझे आगे भी न्याय की अपेक्षा हैं|
देर आये दुरुस्त आये| शायद अपनों को खोने का दर्द अब समझ आए|  सजा तोह हथियारो को हुई है, हथियार चलाने वाले अब भी सरकार पर काबिज़ हैं|