आम आदमी पार्टी का नाम लेते ही दिमाग में अरविन्द केजरीवाल साहब आ जाते हैं। वो india against corruption के एक साफ़ सुथरे कार्यकर्ता थे। पर राह बदली और आ गए राजनीति में। आजादी के बाद हुए कुछ बड़े आंदोलनों में से एक था अन्ना आंदोलन और केजरी बाबू इसी की उपज थे। ऊपर से अन्ना हजारे के चेले, लोगो ने हाथों हाथ लिया. लोगों ने ये सोचा की नई टिकिया है सारे दाग साफ़ कर देगी। मैंने भी अपना पहला वोट इनको ही दिया। पार्टी को पारदर्शी बनाए रखने की बात हुई और कई नामचीन, दिग्गज पार्टी से जुड़ गए। इन दिग्गजो में मशहूर अभिनेत्री मल्लिका साराभाई, लाल बहादुर शास्त्री के पोते आदर्श शास्त्री जो apple में नौकरी छोड़ कर आये थे, समाजसेवी मेधा पाटकर , वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष, कैप्टेन जी. आर. गोपीनाथ, मीरा सान्याल जैसे अनेक नाम शामिल हैं. इन सभी ने पार्टी में विश्वास जताया था और इसके कार्यकर्ता बन गए थे। पार्टी तैयार हो गयी. 2012 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हो गए और इनकी सरकार भी बनी जो 49 दिन चली या फिर कहें की चलाई गई। अभी क्रांन्तिकारी आंदोलन से आये थे सो 49 दिन भी राजनीति के दांव पेंच झेल नहीं सके। भरपूर राजनीति सीखकर फिर से मैदान में आये और 70 में से 67 सीटों पर जबर्दस्त जीत हासिल कर सरकार बना लिए। अब एक्शन लेने की बारी थी और एक्शन लेने शुरू भी हो गए. बस शीला दीक्षित की कोई फाइल नहीं खुली जो वादों में प्रमुख था। सरकार के एक्शन जनता को साफ़ नहीं दिखाई पड़ रहे थे। पर अस्पतालों में, स्कूलों में कुछ काम हुआ था । पर कई ऐसी चीजें थीं जो जनता को साफ दिखाई दे रही थी, केजरीवाल साहब के रोज रोज के नखरे और लफड़ों में पड़ना। पहले अरुण जेटली ने 10 करोड़ के मानहानि का केस ठोक दिया, फिर सास बहू जैसे नजीब जंग से तना-तानी। और तो और अब केजरीवाल-मोदी दोष मंत्र भी कंठस्त कर चुके थे। इन सबके बीच पार्टी से कुलबुलाहट शुरू हुई. कोई ऐसे ही एप्पल और इनफ़ोसिस थोड़े न छोड़ कर आता है। सबको खुश रखने की कोशिश की गयी पर शाजिया इल्मी जैसे नेताओं ने अपने पैंतरे बदल लिए। एक झटका पहले बहिन किरण बेदी दे ही चुकी थी। मंत्रियो पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे और निशाना केजरीवाल को बनाया जाने लगा। कभी पार्टी के नेता जनरैल सिंह ने किसी इंजीनियर को पीट दिया, तो कभी किसी नेता की राशन कार्ड बनवाने के नाम पर बनाई गई ब्लू रौशनी वाली फिल्म ही बाहर आ गयी। कानून मंत्री की फर्जी डिग्री सामने आ गयी तो अलका लांबा और कई नेताओं पर परिवार को फायदा पहुचाने का मामला सामने आया। पर इन सबके बीच कभी केजरीवाल पर सीधा कोई आरोप नहीं लगा। लेकिन काजल की कोठरी में रहने वाला आखिर कितने दिन बेदाग़ रहता! और दोस्ती टूटते ही दोस्त ने पोल खोल दी. अब तक सब ठीक था पर कपिल मिश्रा जी, जो कानून मंत्री के साथ साथ जल विभाग के भी मुखिया थे, उन्होंने कह दिया की 400 करोड़ में से 2 करोड़ अपने केजरी भाई ने भी दबाए थे। अब वो बोलते क्यों नहीं, पद के साथ पदवी जो छीन गयी थी। वैसे भी कपिल मिश्रा जी की माँ बीजेपी की कार्यकर्ता हैं... बागी तो होना ही था क्योंकि पढ़े लिखे भी थे, तो इन्होंने कहीं पढ़ा था- never love your employer.. बस ये बात अपने केजरीवाल साहब नहीं समझ पाए थे, आम आदमी थे न... आगे तो हमें भी इंतज़ार है कि केजरीवाल साहब कैसे पाक साफ बने रहते हैं। मुश्किल समय है, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे दोस्तों ने तो साथ छोड़ ही दिया था. अब कुमार विश्वास के भी बोल अविश्वसनीय लग रहे हैं। मैंने भी किनारा कर लिया है क्योंकि जो वादा फ्री इन्टरनेट का केजरीवाल साहब ने किया था वो मुकेश अंबानी पूरा कर चुके हैं और बाकि वादों पर भी काम होता दिख नहीं रहा है। वैसे मैंने थोड़ा गुस्सा नगर निगम चुनावों में भी दिखा दिया है और अगर नहीं संभले और सीख नहीं ली तो जीवन भर "दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री" की सुविधाएं लेते रहेंगे. वैसे भी वेतन तो 4 गुना कर ही लिया है। बस केजरीवाल जी से मेरा इतना ही अनुरोध है कि india against corruption के कार्यकर्ता जैसा बर्ताव करें क्योंकि अब मैं आपसे खुद को जोड़ नहीं पा रहा हूँ। कुछ तो वजह होगी आपकी इन परेशानियों की, छूटते यारो की, फिसलते दिल्ली की, मुकरते वादों की। अपनी प्राथमिकता को बदलिए। खुद को बदल कर हमारे बीच आईए... वही प्यार मिलेगा ।
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