Wednesday, November 16, 2016

सेनारी नरसंहार

'सेनारी' मेरा ननिहाल हैं, और पूरा गांव मेरे लिए बस ननिहाल ही था | कोई एक घर नहीं, सारे घरों में सामान प्यार और दुलार मिलता है| मेरे तो वहां  हर घर में नाना, मामा थे| १७ साल पहले सब ने एक, दो या चार परिवार के सदस्य खोये थे पर मेरा तो ननिहाल ही खत्म हो गया था| मेरे हर घर में ना मामू थे, ना कोई नाना| बस चीखें थी| मैं छोटा था, इतनी समझ भी नहीँ आई कुछ,  बस मम्मी ने बताया की सब ख़त्म हो गया है| कोई नहीं बचा है|
मैंने पूछा कोई नहीं बचा है का क्या मतलब । मम्मी ने बोला-सब चले हाय हैं अब गांव में कोई नहीं है । मैं एक एक करके अपने मामुयो के नाम ले रहा था और मम्मी ना में सर हिलाये जा रही थी । वह बस एक ही चीज़ दोहराये जा रही थी-जल्दी जाना है सेनारी । गांव में कोई वाहन नहीं था । बाबा जल्दी से मम्मी को साथ लेकर चले गए और मैं अपने गांव रह गया । मेरे यहाँ लोगो की भीड़ लगी थी और मैं भौंचक्क सब को देख रहा था ।।।कई सवाल थे मेरे मन में । आज वृहस्पतिवार का दिन था । मम्मी को कहा पता था कि भगवान विष्णु की उपासना के बाद उसको ऐसी खबर रेडियो देगा । सेनारी के नागरिको से ज्यादा पढ़े लिखे लोग शायद ही किसी गाँव में हो । जज से लेकर डाक्टर तक सब थे वहां ,पर आज सब टूट चुके थे ।जिस गांव में लोग दलितों को अपने द्वार पर भोजन कराते थे उनके मन में आज दलितों के लिए रोष भर गया था ।बच्चो के मन में अपने भाई बाप के मौत का बदला लेने का जुनून सवार था ।
एक खुशहाल गांव नाजुक अंधेर भविष्य के ओर देख रहा था । बची खुची कसर स्थनीय पुलिस प्रशाशन ने पूरी कर दी थी । महिलायों के करुण विलाप को दवाने के लिए लाठीचार्ज किया गया ।जब इस दर्दनाक दुःख की घडी में रक्षक ही भक्षक बन जाये तो क्या मनोस्थिति रही होगी उस गाँव की जरा सोचिए ।
क्या  वो पुलिसकर्मी नर्संहरकर्ता से कम दोषी थे ?
आज सेनारी नरसंहार को १७ साल बीत चुके हैं| जीवन पटरी पर भी लौट चुकी है पर अपनों के खोने का गम सहसा एक पल में उभर आया है|
आज एक फैसला आया है| सेनारी नरसंहार के आरोपियों को फाँसी और उम्रकैद की सजा मिली है| ये फैसला जान गवाने वाले  परिवारों के जख्मों पर कितना मलहम लगाएगा ये तोह नहीं पता पर उनकी उस दर्दनाक घटना की यादाश्त को जरूर जीवित कर देगा ।बहुत सी माँ, पत्नियां शायद ज़िंदा भी नहीं हैं इस फैसले को सम्मान करने के लिए|
खैर,...१० लोगों को फाँसी हुई- ३४ मारे गए थे| 3 को उम्रकैद मिला है और सेनारी में ३० से ज्यादा परिवारों को  उम्र भर की संवेदनहीन-उद्देश्यहीन जीवन मिला था| कितना न्यायसांगत है ये प्रश्न उठाना हम नहीं जानते पर ये जरूर पढ़ा है की 'justice delayed is justice denied ' अभी इस फैसले पर और बहस और ऊपरी अदालत में आवेदन की संभावना बचती है, पर मुझे आगे भी न्याय की अपेक्षा हैं|
देर आये दुरुस्त आये| शायद अपनों को खोने का दर्द अब समझ आए|  सजा तोह हथियारो को हुई है, हथियार चलाने वाले अब भी सरकार पर काबिज़ हैं|

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